ग्लव्स की जगह ईंट लेकर विकेटकीपिंग करने वाला बच्चा कैसे बना दुनिया का बेस्ट विकेटकीपर?

पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया ना कोय
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय

कबीर दास जी की सैकड़ों जगप्रसिद्ध लाइंस में शामिल इन दो लाइंस का गहरा अर्थ है. और इन लाइंस की सबसे खास बात ये है कि इन्हें समझने में ज्यादा वक्त नहीं खर्च करना पड़ता. और अगर इनको जीवन में उतार लिया, फिर तो मौजा ही मौजा. आज की फास्ट लाइफस्टाइल को भले कबीर दास की गहरी बात समझ ना आए, लेकिन इस दुनिया में ऐसे कई दिग्गज हुए हैं जिन्होंने ना सिर्फ इन बातों को समझा, बल्कि जीवन में भी उतारा.

और इसे जीवन में उतारकर अमर हो गए. अब बहुत भूमिका ना बांधते हुए आपको फट से ऐसे ही एक दिग्गज के क़िस्से सुना देते हैं. नाम सैयद किरमानी, काम विकेटकीपिंग. ताजा-ताजा 83 देखकर निकले लोग समझ गए होंगे. जिन्होंने ना देखी उन्हें दिल से माफ ना कर पाते हुए आगे बढ़ना चाहूंगा.

# Syed Kirmani Story

हां तो बात उन दिनों की है जब फारुख इंजिनियर साब अंग्रेजों को उन्हीं की भाषा में जवाब दे रहे थे. मतलब अंग्रेजी में कॉमेंट्री कर रहे थे. और ठीक उसी वक्त कम बाल, ज्यादा टेक्नीक वाले एक विकेटकीपर ने टीम इंडिया के लिए ग्लव्स संभाल रखे थे. वैसे ये विकेटकीपर जो कर रहा था उसे देखते हुए संभाल रहे थे कहना नाइंसाफी होगी. क्योंकि इसने मशहूर भारतीय स्पिन चौकड़ी से लेकर कपिल की पेस के तक के आगे समान धमक के साथ विकेटकीपिंग की. टेस्ट में लगभग दो सौ शिकार किए. वो भी उस दौर में जब टेक्नॉलजी और सपोर्ट स्टाफ के नाम पर कुछ नहीं होता था.

जस्ट अभी ऋषभ पंत के 100 शिकार सेलिब्रेट करने वाली पीढ़ी इन आंकड़ों को हल्का मानेगी. लेकिन 29 दिसंबर 1949 को मद्रास में पैदा हुए किरमानी के आंकड़े इसलिए बेहद खास हैं, क्योंकि स्कूल के वक्त में वह प्योर एथलीट थे. वह स्टेट स्कूल लेवल पर 100 मीटर, 200 मीटर और रिले रेस में लगातार भाग लेते थे. और इससे जो एनर्जी बचती उसमें किरमानी हॉकी खेलते थे. और फिर इसके बाद कहीं जाकर क्रिकेट और फुटबॉल का नंबर आता था.

अपने क्रिकेट के शुरुआती दिनों के बारे में उन्होंने द क्रिकेट मंथली के विशाल दीक्षित से बात करते हुए कहा था

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